Tuesday, February 09, 2021

Some poems - 1 - एक सवाल मंज़िल से

Having travelled to my hometown recently, I found one of my older diaries from early college days, back when I still used to write poems. Many of them are undated, so I can't recall what inspired me to write them back then :)

Nevertheless, sharing some that I found refreshing while reading today.

Crediting https://hindi.changathi.com/ for helping me convert English text into Hindi where required.


एक सवाल मंज़िल से


मैंने एक दिन पूछ लिया मंज़िल से


तुम्हे पाना सब चाहते हैं ,

तुम्हारे लिए अपना जी जान लड़ाते हैं

तुम्हे पाने के लिए कुछ भी कर जाते हैं


पागल हो जाते हैं जाने कितने तुम्हारे दीदार में 

खानपान तक भूल जाते हैं तुम्हारे ख्याल में

खुद को रंक - बैरागी बना लेते हैं तुम्हारे इंतज़ार में 


फिर तुम क्यों नहीं मिलती उन सबसे ज़िन्दगी की राहों में ?

फिर तुम क्यों नहीं थामती उनको कभी अपनी बाहों में?


तो फिर मंज़िल ने कहा मुझसे


ज़िन्दगी में एक मुकाम तो सभी पाना चाहते हैं

और ये भी सच है,

मुझसे एक मुलाकात के लिए लोग जाने क्या क्या कर जाते हैं


फिर भी उनमे से कुछ ही अपनी नैया पार लगा पाते हैं

क्यूंकि


ये वो लोग हैं,

जो जितना मुझे पाना चाहते हैं, उससे कहीं ज़्यादा खोकर मेरे पास आते हैं

मैं एक झटके में ना मिलु, तो भी हार नहीं मानते हैं

और गिर जाने पर भी, फिर उठकर मेरी ओर ही बढ़ते चले आते हैं |

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